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Krishna Janmasthami 2020: कृष्ण जन्माष्टमी व्रत का महत्व, तारीख, पूजा मुहूर्त आदि के बारे में जानें विस्तार से

Krishna Janmasthami 2020: कृष्ण जन्माष्टमी, हिन्दुओं द्वारा बनाया जाने वाला सबसे बड़े पर्व में से एक है, भगवान श्रीकृष्ण के भक्तों की संख्या देश में ही नहीं विदेश में भी अनगिनत है. जानिए इस दिन का महत्त्व.

श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत

( 1 ) 11 अगस्त, मंगलवार: अर्धरात्रि – व्यापनी अष्टमी ( गृहस्थियों के लिये )

( 2 ) 12 अगस्त, बुधवार: उदयकालिक अष्टमी ( वैष्णव, संन्यासियों के लिये )

गतवर्षों की भांति इस वर्ष ( विक्रम संवत 2077 में ) श्री कृष्ण जन्माष्टमी (Krishna Janmasthami) व्रतादि का पर्व स्मार्त और वैष्णव भेद से दो दिन आ रहा है. परंपराया इस व्रत के संबंध में दो मत प्रचलित हैं, स्मार्त लोग (सामान्य गृहस्थी) अर्ध रात्रि का स्पर्श होने पर सप्तमी युत्ता अष्टमी में व्रत उपवास करते हैं, क्योंकि इनके अनुसार भगवान श्री कृष्ण का अवतार अर्धरात्रि के समय (रोहिणी नक्षत्र एवं वृष राशि में चंद्रोदय होने पर ) अष्टमी तिथि में हुआ था.

जबकि वैष्णव मतावलम्बी अर्धरात्रि अष्टमी की उपेक्षा करके नवमी विद्धा अष्टमी में व्रत आदि करने में विश्वास रखते हैं:

‘स्मार्तानां गृहणी पूर्वा पोष्या, निष्काम वनस्थेविधवामि: वैष्णवैश्च परेवा पोष्या ! वैष्णवास्तु अर्द्धरात्रिव्यापिनीमपि रोहिणी सप्तमी विद्धां अष्टमीं परित्यज्य नवमी युतैव ग्राह्या !! ( धर्मसिंधु )

अधिकांस शास्त्रकारों ने अर्धरात्री व्यापिनी अष्टमी में ही व्रत, पूजन एवं उत्सव मनावे की पुष्टि की है ! श्रीमद्भागवत, विष्णु पुराण, वायु पुराण, अग्नि पुराण, भविष्य पुराण, आदि भी अर्धरात्रि युक्ता अष्टमी में ही श्री भगवान के जन्म की पुष्टि करते है:

”गतेअर्धरात्रसमये सुप्ते सर्वजने निशि !! भाद्रेमास्य-सिते पक्षेsष्टम्यां ब्रह्मार्क्षसंयुजि !! सर्वग्रहशुभे काले-प्रसन्नहृदयाशये अविरासं निदेनैव रूपेण हि अवनीपते !!”(भविष्य पुराण )

धर्मसिंधुकार का भी यहि अभिमत है –

कृष्ण जन्माष्टमी निशीथ व्यापिनी ग्राह्या !
पूर्वदिन एव निशीथ योगे पूर्वा !!

इस प्रकार सिद्धांत रूप में तत्काल व्यापिनी (अर्धरात्रि व्यापिनी) (अर्धरात्रि व्याप्त) तिथि अधिक शास्त्र सम्मत एवं मान्य रहेगी ! कुछ आचार्य तो केवल अष्टमी तिथि को ही जन्माष्टमी का निर्णायक तत्व मानते हैं ! रोहिणी से युक्त होने पर तो श्री कृष्ण जन्माष्टमी ‘जयंती’ संज्ञक कहलाती है !

‘कृष्णाष्टम्यां भवेदयत्रकलैका रोहिणी यदि !

जयन्ती नाम सा प्रोक्ता उपोष्या सा प्रयतनत: !!(अग्नि पुराण) ‘ध्यान रहे’ भगवान श्री कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा-वृंदावन में तो वर्षों की परंपरानुसार भगवान श्री कृष्ण जन्माष्टमी के जन्मोत्सव को सूर्य उदयकालिक एवं नवमी विद्धा श्री कृष्ण अष्टमी मनाने की परंपरा है ! जबकि उत्तरी भारत में लगभग सभी प्रांतों में सैकड़ों वर्षो से अर्धरात्रि एवं चंद्रोदय व्यापिनी जन्माष्टमी में व्रत आदि ग्रहण करने की परंपरा है !

परंतु केंद्रीय सरकार अर्धरात्रि कालिक अष्टमी की उपेक्षा करके प्रायः उदयकालिक अष्टमी को जिसमें नवमी लग रही हो उसी तिथि को ही सरकारी अवकाश घोषित कर देती है ! तथा मथुरा आदि के मंदिरों में प्राय उदय कालिक वाली श्री कृष्ण जन्माष्टमी दोनों कार्यों (उत्सव व अवकाश ) के लिए उपयुक्त होती है ! यह तिथि पुर्वाहण् – व्यापिनी तथा दिन के द्वितीय पर व्याप्त अमावस ली जाती है !

आप सभी निश्चय पूर्वक अपनी परम्परानुसार व्रत लें,

11 अगस्त को रात्रि व्रत, 12 को वैष्णव व्रत वाली जन्माष्टमी है.

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